सोमवार, ४ जुलै, २०१६

बीते जमाने...!


उठ जाता हूं भोर से पहले, सपने सुहाने अब नही आते...
मुझे स्कूल न जाने के बहाने नये बनाने नही आते...!

कभी पा लेते थे घरसे निकलतेही मंजिलोंको...
अब मीलों सफर करकेभी, ठिकाने नही आते...!

मुंह चिढाती है खाली जेब महीनेके आखिर में...
बचपनकी गुल्लकमें अब पैसे बचाने नही आते...!

यूं तो रखते हैं बहुतसे लोग पलकोंपर मुझे...
पर युंही कोई गोदीमें उठाने नही आते...!

माना की जिम्मेदारियोंकी बेड़ियों में जकड़ा हूं...
बचपनकी तरह छुड़वाने दोस्त पुराने नही आते...!

बहला रहा हूं बस दिलको बच्चोंकी तरह...
जानता हूं, फिरसे बीते जमाने नही आते...!

- अंजान -